भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के प्लान बी से क्यों घबरा रही है कांग्रेस?

22 साल में पहली बार कांग्रेस के पास गुजरात विधानसभा चुनाव 2017 में शानदार पिच है। वहीं भाजपा गीली पिच पर बैटिंग कर रही है। 27 नवंबर की प्रधानमंत्री मोदी की जनसभाओं में खाली कुर्सियों ने जितना कांग्रेस का सीना फुलाया है, उतना ही पार्टी भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के प्लान से घबरा भी रही है।

यह घबराहट इसलिए भी बढ़ रही है क्योंकि भाजपा ने कुछ दिनों के लिए अपना मुख्यालय गुजरात शिफ्ट कर लिया है। अशोक रोड पर सन्नाटा पसरा है और अमित शाह भी लगातार राज्य में ही कैंप कर रहे हैं। हालांकि पार्टी के गुजरात आईटी सेल के प्रमुख रोहन गुप्ता और बड़ौदा से कांग्रेस के नेता हरेश मलानी दोनों का मानना है कि भाजपा का अंतिम अ हिन्दू-मुसलमान के नाम पर चुनाव का ध्रुवीकरण कराना है।

हरेश मलानी का कहना है कि प्रधानमंत्री ने 27 नवंबर से गुजरात की अस्मिता का रंग देना शुरू किया है, लेकिन मुझे नहीं लग रहा है कि जनता इस झांसे में आएगी। क्योंकि प्रधानमंत्री ने 2012 के विधानसभा चुनाव में गुजरात की अस्मिता के साथ-साथ खुद को भावी प्रधानमंत्री के रूप में प्रस्तुत करने का दांव अजमा लिया था। मोदी प्रधानमंत्री बन भी गए अब आखिर इससे आगे क्या?

वहीं रोहन गुप्ता का कहना है कि भाजपा गुजरात अस्मिता और प्रधानमंत्री के चेहरे का दांव न चलने की दशा में सांप्रदायिकता का कार्ड जरूर खेलेगी। हालांकि गुप्ता का कहना है कि भाजपा ने कुछ दिनों से इसका फ्लेवर देना शुरू किया है, लेकिन जमीन पर इसका असर नहीं दिख रहा है।

रोहन का कहना है कि जिस तरह से विकास के मुद्दे पर भाजपा खुलकर सामने नहीं आ रही है, वहीं कांग्रेस ने विकास, सामाजिक गठजोड़, भ्रष्टाचार, नोटबंदी, जीएसटी और प्रधानमंत्री की आर्थिक नीतियों पर हमला तेज कर दिया किया है। कांग्रेस आईटीसेल के प्रभारी का कहना है कि इसका असर भी दिखने लगा है।

ये है अमित शाह का प्लान-बी…

27 नवंबर नामांकन का आखिरी दिन था। अब आगे चुनाव प्रचार का घमासान है। कांग्रेस के नेताओं का कहना है कि वह सीधे-सादे और आक्रामक प्रचार पर फोकस कर रहे हैं। इसमें जनसभा, पदयात्रा, रोड-शो शामिल है। इसके अलावा व्हाट्सएप संदेश, सोशल मीडिया समेत अन्य को राजनीतिक टूल के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है।

वहीं भाजपा इन सब साधनों के इस्तेमाल के साथ-साथ तोड़फोड़-जोड़ की राजनीति, बदनाम करने का खेल भी अजमा रही है। इसके अलावा वह राज्य में सांप्रदायिक सौहार्द को भी खराब कर सकती है। जिस तरह से भाजपा ने आक्रामक प्रचार शैली को अपनाया है, उससे इसका खतरा बढ़ने लगा है।

आंतरिक चुनाव कार्यक्रम पर निगाह
कांग्रेस के नेता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद के चुनाव को लेकर भी सहमे हैं। उन्हें भीतर-भीतर यह भय सता रहा है और पांच दिसंबर के बाद ही इससे ऊबर पाने की संभावना है। यह भय है राहुल गांधी के मुकाबले में किसी सदस्य को चुनाव में उतरने के लिए तैयार करने का। 

सूत्र बताते हैं कि इसके लिए भाजपा किसी कांग्रेस के नेता के कंधे पर बंदूक रख सकती है। पार्टी के एक महासचिव का कहना है कि मौजदा भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह हैं। वह कड़ी मेहनत के साथ सभी विकल्पों पर काम कर सकते हैं। कांग्रेस पार्टी के गुजरात विधानसभा चुनाव को पटरी से उतारने के लिए यह कोशिश भी अजमाई जा सकती है।

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