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रिंग में पंच के साथ दिमाग चलाना जरूरी : मैरी कॉम

गुरुग्राम। एशियन मुक्केबाजी चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीत कर लौटी पांच बार की विश्व चैंपियन व ओलंपिक पदक विजेता भारतीय महिला मुक्केबाज एमसी मैरी कॉम ने संवाददाता सम्मेलन में कहा कि जब भी मैं किसी चैंपियनशिप में खेलने जाती हूं तो मुझे सामने वाला मुक्केबाज नहीं दिखता। मैं सिर्फ स्वर्ण पदक देखती हूं और यही मेरी जीत का राज है। मैं हर फाइट व चैंपियनशिप से पहले कड़ा अभ्यास करती हूं। चैंपियनशिप में जाने के बाद मैं कभी नहीं देखती कि सामने किस देश का प्रतिद्वंद्वी है। जो मुक्केबाज फाइट से पहले यह सोचता है कि सामने किस देश का मुक्केबाज है वह अपने आप हार के करीब पहुंच जाता है। मुक्केबाजों को रिंग में पंच के साथ-साथ दिमाग भी चलाते रहना चाहिए तभी सफलता मिलती है।रिंग में पंच के साथ दिमाग चलाना जरूरी : मैरी कॉम

बॉङ्क्षक्सग फेडरेशन ऑफ इंडिया (बीएफआइ) के ऑफिस में आयोजित प्रेस वार्ता में राज्यसभा सदस्य मैरी ने कहा कि मेरा अगला लक्ष्य कॉमनवेल्थ गेम्स का स्वर्ण पदक है। मेरे लिए वापसी करना कठिन था, क्योंकि अभ्यास के साथ राज्यसभा सत्र में शामिल होना बड़ा मुश्किल दौर होता है लेकिन भगवान का शुक्र है कि मैं कामयाब रही। 48 किलोग्राम या 51 किलोग्राम में खेलना मेरे लिए कोई मुश्किल काम नहीं है। अब इतना लंबा अनुभव हो गया है कि कुछ भी मुश्किल नहीं लगता है। सभी पूछते हैं कि मैं कब तक खेलती रहूंगी। मेरा यही कहना है कि मेरी फिटनेस जब तक रहेगी, मैं देश के लिए पदक जीतना चाहती हूं।

उन्होंने कहा कि देश के युवा मुक्केबाजों में बहुत प्रतिभा है लेकिन खिलाडिय़ों को नए दौर की मुक्केबाजी को को अपनाने के साथ अपने दिमाग को भी पंच की तरह तेज दौड़ाना होगा। जब तक पंच व दिमाग एक साथ नहीं चलेगा, तब तक जीत नहीं मिलेगी। मुक्केबाजों को हर सेकंड देखना होगा कि सामने वाला क्या कर रहा है और क्या करने जा रहा है। भारत के युवा मुक्केबाजोंं में इसका अभाव है।

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