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सातवीं की छात्रा ने PM मोदी को लिखा ‘दर्दभरा’ खत, वजह जान आप भी करेंगे सलाम

कक्षा सात की छात्रा ने पीएम मोदी को एक ऐसा खत लिखा, जिसके शब्द आपके दिल को भी छू जाएंगे। आदरणीय प्रधानमंत्री जी, मेरा पहाड़ दर्द से कांप रहा है, पलायन से गांव खाली हो रहे हैं। घरों की रखवाली के लिए बुर्जग रहे गए हैं। यहां के स्कूलों में मूलभूत सुविधाओं का टोटा है, जिस कारण छात्र-छात्राओं को खासी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।

सर, आप उत्तराखंड की राजधानी गैरसैंण बनवा दीजिए, जिससे पहाड़ के लोगों को जरूरी सुविधाएं मिल सके। ये शब्द, कनकचौंरी निवासी व नालंदा पब्लिक स्कूल, रुद्रप्रयाग में कक्षा 7वीं में पढने वाला आकांक्षा नेगी के हैं, जो उसने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखे पत्र में कहे हैं।

छात्रा ने प्रधानमंत्री को उत्तराखंड, खासकर पहाड़ के हालातों को रूबरू कराया है। कहा, कि आपने बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओं और स्वच्छ भारत जैसे अभियान चलाकर आमजन में जागरूकता फैलाने का काम किया है। लेकिन पहाड़ में मूलभूत सुविधाएं नहीं होंने से लोग खासे परेशान हैं।

शिक्षा, स्वास्थ्य, संचार, सडक़, बिजली जैसे सुविधाएं मात्र खानापूर्ति साबित हो रहे हैं। कई दूरस्थ गांवों की बेटियों को प्राथमिक के बाद पढ़ाई छोडनी पड़ रही है। जून 2013 की केदारनाथ आपदा में बहे झूला पुलों का आज तक पुनर्निर्माण नहीं हो पाया है।

ताकि ‘पहाड़’ से रास्ते हों जाए आसान

आपदा के बाद से पुलों के स्थान पर जो ट्रालियां लगी हैं, वे लोगों को बार-बार जख्म दे रही हैं। ऐसे में ग्रामीण व स्कूली बच्चे डरे-सहमे हैं। पहाड़ में जंगली जानवरों का आतंक दिनोंदिन बढ़ रहा है, जिससे खेती और पशुपालन को नुकसान पहुंच रहा है।
छात्रा ने प्रधानमंत्री ने पहाड़ के हितों को देखते हुए उत्तराखंड की स्थायी राजधानी गैरसैंण बनाने की गुहार लगाई है। इधर, गैरसैंण स्थायी राजधानी संघर्ष समिति के अध्यक्ष मोहित डिमरी, पीएस नेगी, भूपेंद्र नेगी, केपी ढौंडिय़ाल, शैलेंद्र गोस्वामी का कहना है कि छात्रा के पत्र ने आमजन की उम्मीदों को नया बल दिया है।

लिखा कि, प्रधानमंत्री जी, मैं आपको यह भी बताना चाहती हूं कि गांवों के अधिकांश स्कूलों में न तो अध्यापक हैं और न ही अन्य सुविधाएं। कई स्कूलों में तो शौचालय और पीने का पानी भी नहीं है, जिससे हम लड़कियों को ज्यादा समस्या होती है। मिडिल के बाद हाई स्कूल और इंटर कालेज बहुत दूर हैं।

ऐसे में गांव की लड़कियों को पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ जाती है क्योंकि माता-पिता अपनी बेटियों को गांव से अधिक दूर पढ़ने के लिए नहीं भेजते हैं। ऐसे में बेटियां कैसे पढ़ेंगी। हमारे पहाड़ का जीवन बहुत कठिन होता है सर, यहां कई समस्याएं हैं, सड़क, स्वास्थ्य, जंगली जानवर का भय और उससे भी अधिक भूस्खलन, भूकंप और बाढ़ का भय। मेरी मां को आज भी घास-लकड़ी लेने जंगल जाना होता है और वहां हमेशा गुलदार या भालू का भय होता है।

बेटियों के लिए भी छलका दर्द
मोदी सर, आपने श्रीनगर गढ़वाल में पिछले साल भाषण में गढ़वाली में दो शब्द कहे तो मुझे बहुत अच्छा लगा था। मेरे पिता कहते हैं कि यदि राजधानी गैरसैंण होती तो गांव में ये समस्याएं नहीं होती। नेता और अधिकारी पहाड़ में हमारी तरह रहते तो हमारा दर्द समझ पाते।
यदि राजधानी गैरसैंण होती तो लोग पहाड़ छोड़कर मैदानों की ओर नहीं जाते। मेरे पिता कहते हैं कि उन्हें और बड़े लोगों को देहरादून आने-जाने में भी परायेपन का अहसास होता है। यदि गैरसैंण स्थायी राजधानी होती तो पहाड़ के लोगों को अधिक सुविधा होती, अपनेपन का अहसास होता।

मोदी जी, आपने कहा था कि पहाड़ की जवानी और पहाड़ का पानी पहाड़ों के काम ही आएगा। ऐसा कब होगा? अधिक कुछ नहीं कहती हूं। आपसे विनती है कि यदि आप सच्चे दिल से चाहते हैं कि बेटियां बचाओ-बेटियां पढ़ाओ, तो मेरा कहना है कि आप हमारे पहाड़ को बचा लो, यदि पहाड़ बचाना है और यहां की बेटियों को पढ़ाना है तो यहां हम लोगों को मूलभूत सुविधाएं चाहिए। आपसे विनती है प्लीज, गैरसैंण राजधानी बना दो। प्लीज, प्लीज।

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