Wednesday , March 3 2021

इस साल न्यूक्लियर बटन की खूब चर्चा हुई, आइये हम बताये कैसा होता है ये बटन

नए साल के मौके पर इस बार न्यूक्लियर बटन की खूब चर्चा हुई। शुरुआत हुई नॉर्थ कोरिया के नेता किम जोंग-उन से जिन्होंने नए साल पर अपने भाषण में कहा कि मेरे ऑफिस की मेज पर न्यूक्लियर बटन है और पूरा अमेरिका हमारी न्यूक्लियर मिसाइलों की जद में है। इसी के जवाब में अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने ट्वीट कर कहा कि मेरे पास भी न्यूक्लियर बटन है, जो किम के बटन से ज्यादा बड़ा और शक्तिशाली है। सबसे बड़ी बात कि मेरा बटन काम भी करता है। इस साल न्यूक्लियर बटन की खूब चर्चा हुई, आइये हम बताये कैसा होता है ये बटन

नॉर्थ कोरिया और अमेरिका की तनातनी कोई नई बात नहीं है। सभी जानते हैं कि परमाणु कार्यक्रम की वजह से ही ये तनातनी इस हद तक पहुंची है कि किम अक्सर अमेरिका पर परमाणु हमले की धमकियां देते रहते हैं। हालांकि, इस तनातनी में जो नई चीज निकलकर आई, वह है न्यूक्लियर बटन। क्या वाकई ट्रंप के पास किम से बड़ा न्यूक्लियर बटन है? और क्या न्यूक्लियर बटन जैसी कोई चीज वास्तव में है भी? 

देखा जाए तो बटन शब्द का आशय हम जिस स्विचनुमा चीज से लगाते हैं, वैसा परमाणु हथियारों के मामले में नहीं होता। यहां न्यूक्लियर बटन दबाने का मतलब न्यूक्लियर हथियारों का इस्तेमाल करने से जुड़ा है। परमाणु हथियारों का इस्तेमाल बटन दबाने की तुलना में कहीं ज्यादा जटिल है। मसलन, अमेरिका की ही बात करें तो यहां राष्ट्रपति के पास हर समय परमाणु हथियारों को इस्तेमाल करने का अधिकार होता है। इससे जुड़े आर्मी अफसरों का समूह और जरूरी चीजें न्यूक्लियर ब्रीफकेस भी कहलाती हैं। 

राष्ट्रपति जब देश से बाहर भी होते हैं, उनके साथ यह टीम रहती है। इसमें आर्मी अफसरों के अलावा कम्युनिकेशन टूल्स और विस्तार से वॉर प्लान की डिटेल्स लिए हुए एक किताब भी होती है। अगर राष्ट्रपति को हमले का आदेश देना है तो उन्हें पेंटागन (अमेरिकी रक्षा मंत्रालय) के सैन्य अधिकारियों से एक खास कोड के माध्यम से संपर्क करना होगा। यह कोड सिर्फ राष्ट्रपति के पास होता है और इसी से उनकी पहचान होती है। ये कोड एक कार्ड में दर्ज होते हैं जिसे राष्ट्रपति हर समय अपने साथ रखा करते हैं। इसी के बाद राष्ट्रपति की तरफ से दिया गया लॉन्च का आदेश पेंटागन और स्ट्रैटिजिक कमांड तक पहुंचता है। 

कुल मिलाकर परमाणु हमला इतना संवेदनशील और भीषण मसला है कि एक लोकतांत्रिक देश में इसे किसी एक व्यक्ति, कमान या बटन के दायरे तक सीमित नहीं रखा जाता। 

अमूमन हर परमाणु शक्ति से संपन्न देश के पास परमाणु हथियारों के इस्तेमाल से जुड़ा कोई न कोई मेकनिजम होता है। उदाहरण के लिए भारत में परमाणु हथियार कार्यक्रम से जुड़े किसी भी फैसले के लिए न्यूक्लियर कमांड अथॉरिटी (एनसीए) है। यही इसकी कमांड, कंट्रोल और इस्तेमाल से जुड़े फैसले करती है। इसमें दो काउंसिल हैं – पॉलिटिकल काउंसिल और एग्जेक्युटिव काउंसिल। पॉलिटिकल काउंसिल के प्रमुख प्रधानमंत्री होते हैं जबकि एग्जेक्युटिव काउंसिल के मुखिया राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) होते हैं। जब भी जरूरी होगा एग्जेक्युटिव काउंसिल परमाणु हमले की सिफारिश पॉलिटिकल काउंसिल से करेगी। दोनों स्तर पर फैसला लिए जाने के बाद एनसीए के आदेश को अमल में लाने का काम स्ट्रैटिजिक फोर्सेज कमान का होता है। यह कमान किसी एयर मार्शल रैंक के कमांडर इन चीफ के कंट्रोल में रहती है। इसी के पास स्ट्रैटिजिक न्यूक्लियर फोर्सेज के मैनेजमेंट और ऐडमिनिस्ट्रेशन का जिम्मा रहता है। 

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