ऐसी परवरिश से बच्चे बन रहे हैं संवेदनहीन

कई बार पैरंट्स की उम्मीदों का बोझ इतना भारी हो जाता है कि उससे दबकर बच्चे कहीं गुम से हो जाते हैं। बच्चा कौन सा काम अच्छी तरह से कर सकता है या उसकी किस चीज में रुचि है, यह जाने बिना ही हम उसे डॉक्टर और इंजीनियर बनाने पर अमादा हो जाते हैं। पढ़ाई में अच्छे नंबर लाने के लिए दबाव बनाने से लेकर होशियार बच्चों से तुलना करना इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। ऐसी परवरिश से बच्चे बन रहे हैं संवेदनहीन

पढ़ाई में अच्छा परफॉर्म न कर पाने की वजह से हम उन्हें नीचा दिखाने और उन पर दूसरे तरह के प्रतिबंध लगाना शुरू कर देते हैं। एक वक्त ऐसा भी आता है, जब बच्चा परेशान होकर या तो खुद को नुकसान पहुंचाता है या फिर गुस्से में दूसरों को नुकसान पहुंचाता है। इसका ही एक उदाहरण बीते दिनों नोएडा में हुआ डबल मर्डर है, जिसमें बेटे ने अपनी मां और बहन की बैट व कैंची मारकर हत्या कर दी। 

जब इस केस की पड़ताल की गई तो पता चला कि बच्चे में इस बात की कुंठा थी कि पैरंट्स उससे ज्यादा बहन को तवज्जो देते थे क्योंकि वह पढ़ाई में अच्छी थी और हमेशा उसकी तुलना बहन और बाकी बच्चों से करते थे। ऐसे में, 15 साल की उम्र में कोई बच्चा किसी की हत्या करने जैसा बड़ा कदम कैसे उठा लेता है और कैसी परवरिश बच्चों को इतना संवेदनहीन बना देती है, यह जानने की कोशिश की हमने। 

संवेदना घटाता है हिंसात्मक वातावरण 
सायकायट्रिस्ट डॉ़ आदर्श त्रिपाठी के मुताबिक जहां आम बच्चे एक डांट से रोने लगते हैं, वहीं आपके बच्चे पर अगर पिटाई का कोई असर नहीं होता, बल्कि वह और गुस्सा करने लगता है और हाथापाई पर उतारू हो जाता है तो यह समझने की जरूरत है कि उसके लिए मार-पिटाई आम बात हो गई है। 

इसका बहुत बड़ा कारण है, घर और समाज में होने वाली हिंसा। ऐसा ही एक केस मेरे सामने आया, जिसमें स्कूल में 10वीं में पढ़ने वाले स्टूडेंट ने अपनी मां पर हमला कर उन्हें घायल कर दिया तो पिता उसे काउंसलर के पास ले गए। बातचीत के दौरान पता चला कि उसके फेवरिट मोबाइल गेम्स और टीवी शो हिंसा से जुड़े हैं। 

वहीं स्कूल में दोस्तों की टोली भी बिगड़ैल है। किसी भी तरह की हिंसात्मक घटना का बार-बार सामना होने से, मार-पिटाई और खून खराबे जैसी चीजों के प्रति इंसान संवेदनहीन हो जाता है। ऐसे में जरूरी है कि पैरंट्स बच्चों को हिंसात्मक कंटेंट से दूर रखें। इसके लिए पैरंट्स को खास ध्यान रखने की जरूरत होती है। 

पेंटर को बनाना चाहा डॉक्टर 
मुमकिन नहीं है कि हर बच्चा पढ़ाई में टॉप करे। कई बच्चे एवरेज रहकर भी नाम कमाते हैं। कुछ ऐसा ही दिल्ली में रहने वाले एक डॉक्टर परिवार के 12वीं में पढ़ने वाले बच्चे के साथ हुआ। डॉक्टर पैरंट्स चाहते थे कि उनका बेटा भी डॉक्टर बने। इसके लिए 12वीं क्लास में अच्छे नंबर लाने का दबाव बनाना शुरू कर दिया। 

हालांकि, प्रीबोर्ड एग्जाम में वह लगातार खराब परफॉर्म करता रहा। खराब परफॉर्मेंस देखकर पैरंट्स ने उसे खूब डांटा और एक रात तो पढ़ने के बजाय ड्रॉइंग बनाने को लेकर उसे घर से बाहर तक निकाल दिया। इसका बच्चे पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा। इसके बाद से बच्चा गुमसुम रहने लगा और एक वक्त ऐसा आया कि उसने अपना दिमागी संतुलन खो दिया। 

सायकॉलजिस्ट ने बच्चे से हॉबी जाननी चाही तो उसने क्लास में बनाई सभी ड्रॉइंग की शीट्स दिखा दीं, जो उसने पैरंट्स के डर से छिपाकर रखी थीं। वह खूबसूरत पेंटिंग्स किसी आर्टिस्ट के वर्क से कम नहीं थीं लेकिन पैरंट्स के प्रेशर की वजह से न तो वह डॉक्टर बना और न ही पेंटर बन पाया।

तुलना से बेकाबू होता गुस्सा 
सायकायट्रिस्ट हमें एक केस बताते हैं, ‘क्लास टेस्ट में फेल होने और पैरंट्स टीचर मीटिंग में सबके सामने जलील होने के बाद एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ने वाला 11वीं का स्टूडेंट जब घर पहुंचा तो छोटा भाई भी उसे डफर कहकर चिढ़ाने लगा। शाम को पापा के घर आने पर क्लास टेस्ट में फेल होने वाली बात बताने वाला भी छोटा भाई था। पापा ने खराब परफॉर्मेंस पर बेटे की क्लास लगाई। इस बात से आहत स्टूडेंट जैसे ही अपने कमरे में पहुंचा तो छोटा भाई पहले से वहां उसका मजाक उड़ाने के लिए बैठा था। इस दौरान दोनों के बीच झगड़ा इतना बढ़ गया कि उसने अपने छोटे भाई का हाथ तोड़ दिया। भले ही इस घटना को महज कुछ सेकंड के गुस्से का नतीजा समझा जाए लेकिन सायकायट्रिस्ट मन में पनप रही कुंठा को इसकी मेन वजह बताते हैं। 

इन बातों पर करें गौर 
आपके बच्चे में किस तरह की रचनात्मकता है, यह पहचानना जरूरी है। 

जरूरी नहीं कि आपका बच्चा सिर्फ पढ़ाई में अच्छा कर सके। 

अपने बच्चे की क्षमता समझें। अगर कुछ अच्छा नहीं कर सकता तो उस पर दबाव न बनाएं। इससे वह तनावग्रस्त हो सकता है। 

गुस्से में आकर उनके लिए डफर और बुद्धू जैसे शब्दों का प्रयोग न करें। 

किसी से तुलना न करें। 

बच्चों को वॉयलेंस एक्सपोजर से दूर रखें। 

ये ध्यान रखें पैरंट्स 
बच्चों के गुस्से को खेल-कूद या दूसरी ऐक्टिविटीज के जरिए सकारात्मक दिशा में मोड़ा जा सकता है। बच्चों की रुचि का ध्यान रखें। 

बार-बार झुंझलाना, कुछ दोस्तों तक ही खुद को समेट लेना, गुमसुम रहना, किसी काम में फोकस न रहना जैसे लक्षण देखते ही अलर्ट हो जाएं। 

14 साल से 18 साल की उम्र बहुत नाजुक होती है और बच्चे इमोशन को सही तरह से समझ नहीं पाते। ऐसे में उनसे बातचीत का चैनल खुला रखें। 

माता-पिता बच्चों के रोल मॉडल होते हैं। अगर बच्चे को मोबाइल के सही इस्तेमाल को लेकर आगाह करना है तो शुरुआत खुद से करनी होगी। 

9 तरह की होती है इंटेलिजेंस 

  • स्पेशियल
  • इंटरपर्सनल
  • म्यूजिकल
  • बॉडिली
  • लिंग्विस्टिक
  • इंट्रा पर्सनल
  • एग्जिस्टेंशियल
  • लॉजिकल मैथमेटिकल
  • नेचुरलिस्ट
 
 
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