जब चर्च के घंटों ने की मुंबई के लोगों की रक्षा

कई दिनों से जारी जश्न आज ऐन क्रिसमस के दिन परवान पर होगा। इनके केंद्र में होंगे महानगर के चैपेल, चर्च और कैथेड्रल, जहां क्रिसमस के मौके पर विशेष तैयारियां की गई हैं। हम बता रहे हैं मुंबई के ईसाई धर्मस्थलों, उनकी प्रतिमाओं और घंटों से जुड़ी कुछ रोचक किंवदंतियां और कथाएं।

क्रिसमस उसी तरह देश का कॉमन पर्व है, जिस तरह नव वर्ष, दीवाली और ईद। देश की चर्च राजधानी मुंबई के 136 से भी ज्यादा चर्च ईसाइयों ही नहीं, सभी धर्मों को मानने वालों की श्रद्धा का केंद्र हैं। इनमें कुछ तो चार सौ वर्ष से भी ज्यादा पुराने हैं। मुंबई के ये चर्च अपने सौष्ठव, सुंदरता, सज्जा, दर्शनीय संग्रहों के साथ अपने इतिहास और किंवदंतियों के लिए भी उतने ही जाने जाते हैं। 
कई दिलचस्प कहानियां 
इन चर्चों के साथ कई दिलचस्प कहानियां जुड़ी हैं, जिनका संबंध महानगर के इतिहास से है। मसलन, 401वीं वर्षगांठ मना रहे बांद्रा के सेंट एंड्रूज चर्च के तीन विशालकाय घंटों का धार्मिक कार्यों के अलावा कई बार चर्च की रक्षा में भी काम आना। 27 फरवरी, 1700 को मस्कट से सात जहाजों में भर कर आए अरबों ने मुंबई में वर्सोवा तट पर हमला बोलकर भारी तबाही मचाई थी। तब चर्च के घंटनाद ने ही आस-पास की ईसाई आबादी को आने वाली विपत्ति की इत्तिला दी थी। 1793 में चर्च में जो नया घंटा लगा, उसके साथ भी कई किंवदंतियां जुड़ी हैं। मुंबई के सांताक्रुज का तो नाम ही टीले पर मौजूद लकड़ी के क्रास के निशान पर पड़ा था, जिसपर एक दिन आश्चर्यजनक रूप से कोंपलें फूटनी शुरू हो गई थीं। 

सेंट एंड्रूज चर्च की खासियत 
सेंट एंड्रूज बांद्रा का प्राचीनतम चर्च है। चर्च की विशेषता है ‘ऑवर लेडी ऑफ दि नेविगेटर्स’ की प्रतिमा जिसमें ‘मदर ऑफ पर्ल’ शिशु जीसस को बाहों में थामे हुए दिख रही हैं। गोथिक शैली की इस प्रतिमा की प्राचीनता असंदिग्ध है। माना जाता है कि यह वही प्रतिमा है, जिसका उल्लेख 1669 के जमाने के एक पत्र में ‘कोलियों द्वारा माहिम में डाले गए जाल में फंसकर आए होने’ का है। दीगर बात है कि मुंबई के चर्च इतिहासकार आज तक अपना यह शुबहा दूर नहीं कर पाए हैं कि अगर इस चर्च की प्रतिमा मछुआरों द्वारा निकाली गई है, तो माउंट मेरी चर्च (बासिलिका ऑफ अवर लेडी ऑफ द माउंट), बांद्रा में स्थापित ‘अवर लेडी ऑफ द माउंट ‘ की प्रतिमा क्या है? लुप्त होने के बाद प्राप्त होने वाली इस प्रतिमा से बांद्रा के इन दोनों चर्चों के साथ पड़ोसी माहिम के सेंट माइकल चर्च से भी नाता जोड़ा जाता है, जो मुंबई की सबसे पुरानी पोर्चुगीज इमारतों और रोमन कैथोलिक प्रार्थनागृहों में एक, और हिंदुओं में भी उतनी ही लोकप्रिय है। 

दिलचस्प किंवदंती 
किंवदंती है कि 1739 में मराठों के आक्रमण के समय माउंट मेरी चैपल नष्ट हो गया था और प्रतिमा समुद्र के हवाले कर दी गई थी। मछुआरे इसे निकालकर सेंट माइकल चर्च में ले आए। 1761 में स्थिति सामान्य हुई तो प्रतिमा को धूमधाम से वापस माउंट मेरी ले आया गया। 27 जून, 2008 को जीसस क्राइस्ट के चित्र से ‘खून बहने’ के चमत्कार के लिए सेंट माइकल चर्च ने विश्व भर में सुर्खियां बटोरी थीं। यह घटना जिसे अंधविश्वास कर खारिज कर दिया गया था और बाद में वैज्ञानिक परीक्षण में भी जिसकी पुष्ट कथित रूप से उस समय हुई जब चर्च में ‘ऑवर लेडी ऑफ दि परपेचुअल हेल्प’ का उत्सव चल रहा था। तब जीसस के हृदय स्थल से खून बहते देखने के लिए चर्च के बाहर एक किलोमीटर लंबी लाइन लग गई। 

माउंट मेरी की दो और दिलचस्प कथाएं हैं, जिनमें एक के अनुसार 17वीं सदी के आस-पास जब मस्कट के अरबों ने बांद्रा पर हमला किया तो खजाने की लालसा उन्हें माउंट मेरी चर्च ले गई। मुराद पूरी होते न देखकर बौखलाकर वे चर्च में आग लगाने ही जा रहे थे कि क्रुद्ध मधुमक्खियों ने उनपर एक साथ हमला बोल और उन्हें उल्टे पांव भागना पड़ा। 

एक यह भी कहानी 
दूसरी कथा के अनुसार, मदर मेरी दरअसल ‘माथा देवी’ हैं जो मुंबई की सप्तदेवियों-मुंबादेवी, शीतलादेवी, प्रभादेवी, महालक्ष्मी, शांतादेवी और लीलावती की रक्त संबंधों से बहनें हैं। हर वर्ष 8 सितंबर को जब माउंट मेरी फेस्टिवल होता है। मदर मेरी नाव लेकर खुद अपनी बहनों को इसका निमंत्रण देने जाती हैं। क्राइस्ट, मदर मेरी व सेंट जॉन इवेंगलिस्ट की खूबसूरत प्रतिमाओं के साथ आकर्षक आल्टर के लिए मशहूर मरोल का मूल सेंट जॉन इवेंगलिस्ट चर्च अब विहार के गर्भ में विश्राम कर रहा है। कुछ भक्तों का दावा है कि जब भी झील का जलस्तर कम होता है, उन्होंने एक चर्च के घंटाघर का कुछ हिस्सा देखा है। बताते हैं डूबा हुआ यह चर्च ऑवर लेडी ऑफ अंपारो (हेल्प) चर्च है। 

कोई डेढ़ सौ वर्ष पहले जब तत्कालीन मुंबई महानगरपालिका ने विहार की घाटी को मरोल के विकार से खरीदा तो इस चर्च की सैकड़ों वर्ष पुरानी चार फुट की प्रतिमा-जिसमें मदर मेरी को जीसस के बाल रूप के साथ दिखाया गया है- को निकालकर पोर्चुगीज कोंडिता चर्च में ले जाया गया। 1579 में निर्मित यह चर्च आज भी खंडहर रूप में मौजूद है। 

ऐसे पड़ी फादर डिसूजा की निगाह 
महामारी के कारण यह चर्च जब खाली कराया गया, तब उसकी प्रतिमाएं मौजूदा सेंट जॉन इवेंगलिस्ट चर्च में 1840 में ले जाई गईं। आईआईटी, बंबई के ठीक सामने पवई की पहाड़ी पर स्थित होली ट्रिनिटी चर्च 1550 के जमाने का है। होली ट्रिनिटी के मूल चर्च के बारे में भी बताते हैं कि वह भी विहार झील के भीतर समा गया है। डोंगरी, उत्तन के ऑवर लेडी ऑफ बेथेलेहम ने अभी चार वर्ष पहले ही चार सौ वर्ष पूरे होने का जश्न मनाया है। कुछ समय पहले ऐसे गुड फ्राइडे के दिन चर्च में लगी आग में वेदी के ऊपर टंगे जीसस क्राइस्ट की लकड़ी की अत्यंत सुंदर प्रतिमा जलकर क्षतिग्रस्त हो गई थी। बहुत दिनों तीन टुकड़ों में बंटी तक यह प्रतिमा चर्च के ऊपरी लाफ्ट में धूल में लिथड़ी उपेक्षित सी पड़ी रही। 

एक दिन चर्च की पुरानी चीजों की खोजबीन करते फादर वार्नर डिसूजा की निगाह उसपर पड़ी। एक संग्रहालय में रिस्टोरेशन के बाद यह इतनी खूबसूरत दिखती है कि आंखें झपकना भूल जाती हैं। इंडो-पोर्चुगीस शैली में निर्मित यह प्रतिमा कम से कम चार सौ वर्ष पुरानी है। अर्धनिमीलित आंखें-शायद, सूली पर लटकाए जाने पर मृत्यु के तत्काल बाद का चित्रण। जीसस के मुखमंडल पर अपूर्व शांति है। गोरेगांव के सेंट पॉयस कैथोलिक सिमिनरी के म्यूजियम ऑफ क्रिश्चियन आर्ट में प्रदर्शित यह प्रतिमा आज उसका सबसे बड़ा आकर्षण है। 

भूतों के किस्से 
मुंबई के कई चर्चों के साथ ‘भूतों’ के किस्से भी जुड़े हैं। इनमें सबसे आम है सीप्झ (अंधेरी पूर्व) में पांच सौ वर्ष पुराने सेंट जॉन दि बैप्टिस्ट चर्च के खंडहरों में तीन सौ साल पहले अप्राकृतिक मौत की शिकार ‘सफेद फ्रॉक में घूमने वाली’ एक नवविवाहिता का किस्सा, जिससे मुक्ति पाने के लिए कैथोलिक पादरियों को जादू-टोना करना पड़ा था। 

पूर्व सरकारी अधिकारी पी. जी. गणेशन ने जो अंधेरी रात में इस खौफनाक घटना का साक्षी थे-इसका वर्णन अपनी किताब , Ghosts, Occults & Exorcists: True and Real Experiences में कुछ इस तरह किया है, ‘पादरी जब बाइबिल पढ़ रहा था हमें जोरों का अट्टहास सुनाई दिया और फिर जोरों की रुलाई। लगा, जैसे चर्च के बगल के तालाब में कोई जोर से कूदा हो। फिर अचानक सन्नाटा छा गया। अगले दिन इस तालाब की सारी मछलियां मरी पाई गईं।’ मालवणी के सेंट एंथनी चर्च के बारे में बताया जाता है कि वहां आस-पास शादी के बाद मार दी गई एक औरत शादी के जोड़े में कराहती हुई, आते-जाते वाहनों के साथ होड़ लगाती है, जिससे दुर्घटनाएं हो जाती हैं। 
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