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2G केस में सीबीआई कोर्ट के फैसले के बाद कंपनियां कर सकती हैं भारत सरकार से मुआवजे की मांग

विडियोकॉन टेलिकॉम अब यह संभावना तलाशने में जुट गई है कि 2015 में सरकार के खिलाफ टेलिकॉम ट्राइब्यूनल में दर्ज मुकदमे पर तेजी से सुनवाई हो। विडियोकॉन ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2G स्पेक्ट्रम आवंटन रद्द किए जाने के बाद ट्राइब्यूनल में मुकदमा कर सरकार से 10,000 करोड़ रुपये की मांग की थी।

 

 एक सीनियर एग्जिक्युटिव ने पहचान गुप्त रखने की शर्त पर कहा कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के 3 साल के अंदर केस फाइल करने के प्रावधान के तहत मुकदमा दर्ज कराया गया था। तब कंपनी ने वित्तीय घाटा, कारोबार को नुकसान और मुआवजे का हवाला देकर 5,500 और 10,00 करोड़ रुपये के बीच मांग की थी। उन्होंने कहा, ‘हमारे बिजनस को 25,000 करोड़ रुपये का झटका लगा जबकि हमारी कोई गलती नहीं थी। इसलिए 2G जजमेंट सरकार से राहत पाने के मामले में हमारी मदद करेगा।’ गौरतलब है कि 2 फरवीर 2012 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले से विडियोकॉन के 21 लाइसेंस रद्द हो गए थे। 
दरअसल, 2G केस में बुधवार को स्पेशल सीबीआई कोर्ट के आए फैसले ने संयुक्त अरब अमीरात की एतिसलात, नॉर्वे की टेलिनॉर और रूस की सिस्टेमी जैसी उन टेलिकॉम कंपनियों को भारत सरकार के खिलाफ हथियार सौंप दिया जिनके लाइसेंस सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिए थे। जाने-माने वकीलों का कहना है कि ये कंपनियां लाइसेंस आवंटन को खारिज किए जाने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले से 2.5 अरब डॉलर (करीब 160 अरब रुपये) के निवेश के नुकसान की भरपाई की मांग भारत सरकार से कर सकती हैं। 
इन विदेशी टेलिकॉम कंपनियों ने स्थानीय सहयोगियों के जरिए भारत में कदम रखा था जिन्हें 2008 में लाइसेंस और स्पेक्ट्रम प्राप्त हुए थे। 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने जब 122 लाइसेंस रद्द किए किए थे तो इन कंपनियों को भी झटका लगा। सुप्रीम कोर्ट ने स्पेक्ट्रम आवंटन को गलत बताया था। एतिसलात, टेलिनॉर और सिस्टेमा तब से भारत में अपना मोबाइल फोन बिजनस खड़ा करने की कोशिश में हैं। लाइसेंस खत्म होने के बाद एतिसलात का 827 मिलियन डॉलर, टेलिनॉर का 1.4 अरब डॉलर और सिस्टेमा का 1.2 अरब डॉलर का निवेश फंस गया था। 

गुरुवार को सीबीआई कोर्ट ने कहा कि लाइसेंस आवंटन में कोई आपराधिक गलती नहीं हुई है। वकीलों का कहना है कि कोर्ट का यह कहना लाइसेंस खोनेवाली कंपनियों को नुकसान की भरपाई की मांग का मौका प्रदान करता है। कंपनियां अपनी मांग के लिए यह आधार बना सकती हैं कि लाइसेंस आवंटन की नीति भले ही गलत हो, लेकिन उन्होंने (कंपनियों ने) नियमों का पालन किया और कोई गलती नहीं की। इसलिए उन्हें दंडित नहीं किया जा सकता। 

जाने-माने वकील हरीश साल्वे ने कहा, ‘सिस्टेमा और टेलिनॉर को दंडित किया गया। उन्होंने कोई गलती नहीं की। अगर ये कंपनियां उन देशों की होतीं जिनके साथ भारत का द्विपक्षीय समझौता है तो उनके पास भारत से नुकसान की मांग का बड़ा आधार होता।’ लॉ फर्म ट्राइलीगल के पार्टनर आशीष भान ने बताया कि सीबीआई कोर्ट ने स्पेक्ट्रम आवंटन में कोई आपराधिक गलती नहीं पाई इसका साफ मतलब है कि पॉलिसी गलत हो सकती है, लेकिन ऑपरेटर्स को इसका खामियाजा नहीं भुगतना चाहिए था। 

लॉ फर्म खैतान ऐंड कंपनी के असोसिएट पार्टनर हर्ष वालिया ने इसका समर्थन करते हुए कहा, ‘इस फैसले से कुछ अंतरराष्ट्रीय टेलिकॉम कंपनियों और उनकी ओर से निवेश करनेवाली भारतीय कंपनियों को निश्चित तौर पर अपने दावे को दोहराने का हथियार मिल गया है जिन्होंने सुप्रीम कोर्ट के 2012 के फैसले के आलोक में नुकसान की भरपाई की मांग की थी।’ वकीलों का कहना है कि जिन कंपनियों ने पहले ही आर्बिट्रेशन सेटल कर लिया था, अब वह भी राहत पा सकते हैं। 

रूसी कंपनी सिस्टेमा की भारत में जॉइंट वेंचर सिस्टेमा श्याम टेलिवसर्विसेज (एसएसटीएल) के 21 सर्कल्स का लाइसेंस रद्द हुए थे। अब कंपनी भारत में जारी दो मुकदमों के बाद इंटरनैशनल आर्बिट्रेशन में जाने का विकल्प खुला रखा है। नॉर्वे की कंपनी टेलिनॉर ने 2008 में भारतीय कंपनी यूनिटेक वारयरेस से साझेदारी की थी। उसके 22 सर्कलों के लाइसेंस रद्द हुए थे। कंपनी ने 4 अरब डॉलर के निवेश, गारंटीज और डैमेजेज के लिए भारत सरकार से मुआवजे की मांग की थी। इसके लिए कंपनी ने भारत-सिंगापुर व्यापक आर्थिक सहयोग समझौते का सहारा लिया था। हालांकि, सरकार ने टेलिकॉम डिपार्टमेंट को दिए गए 1,325 करोड़ रुपये को अजस्ट कर दिया तो टेलिनॉर ने आर्बिट्रेशन नोटिस वापस ले लिया। 

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