2G फैसला: केस को कमजोर करने में कुछ टेलिकॉम अधिकारियों की बड़ी भूमिका: कोर्ट

देश भर में इस वक्त टू जी स्कैम में सीबीआई की विशेष अदालत का फैसला चर्चा में है। 2010 के इस बहुचर्चित केस में सभी आरोपियों को बरी कर दिया गया है। जज ने अपने फैसले में साफ कहा कि 2007-08 के दौरान टू जी पॉलिसी में लगातार भ्रामक बदलाव किए जाते रहे, अधिकारी इसके बारे में न सिर्फ जानते थे बल्कि इरादतन दुर्भावनापूर्ण नीयत से इस पर अपनी सहमति भी दी। अधिकारियों के गैर-पेशेवर रवैये और अनदेखी ने ए राजा के खिलाफ सीबीआई के केस को खासा कमजोर कर दिया

सीबीआई स्पेशल कोर्ट ने अपने फैसले में इस बात को रेखांकित किया। जस्टिस सैनी ने फैसला पढ़ते हुए कहा, ‘सरकारी अधिकारियों ने पूरी दुष्टता और छल करने के इरादे से आधिकारिक रेकॉर्ड ठीक तरह से जमा नहीं किए। यह सरासर गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार है।’ ए राजा, कनिमोझी और कॉर्पोरेट के वरिष्ठ अधिकारियों के गवाहों के बयान और सरकारी रेकॉर्ड एक-दूसरे से बिल्कुल उलट हैं। ऐसा लग रहा है कि वरिष्ठ टेलिकॉम अधिकारियों की मंशा सिर्फ एक-दूसरे पर जवाबदेही डालने की थी। 

दिलचस्प बात है कि कोर्ट ने माना कि पूर्व टेलिकॉम मंत्री ए राजा के बयान रेकॉर्ड से मिलते हैं। उन्होंने कहा, ‘पूर्व टेलिकॉम मंत्री ए राजा के बयानों में तारतम्य है। उनके बयान सच्चे और स्वीकार किए जाने योग्य हैं।’ दूसरी तरफ सरकारी अधिकारियों के बयानों पर कोर्ट का कहना है कि सरकारी रेकॉर्ड और अधिकारियों के मौखिक निर्देश में साम्य नहीं मिलते हैं। जस्टिस सैनी ने माना कि एके श्रीवास्तव, असीरवाथम आचार्य और डीएस माथुर जैसे वरिष्ठ अधिकारी ए राजा के निजी सेक्रेटरी आर के चंडोलिया की तरह निर्देश पालन में लगे हुए नजर आए। 

सीबीआई का आरोप था कि अधिकारी आचार्य ने कबूल किया था कि शाहिद बलवा का ए राजा के दफ्तर में आना-जाना लगा रहता था। विनोद गोएनका और संजय चंद्रा भी राजा से तब से परिचित थे जब वह पर्यावरण मंत्री थे। आचार्य ने यह भी दावा किया था कि बलवा और गोएनका को उन्होंने राजा के दफ्तर में 20 से अधिक बार आते-जाते देखा था। 

कोर्ट ने इसके बाद जब शंकर भवन का रजिस्टर मंगवाया तो उसमें इस तरह की कोई जानकारी नहीं मिली। विजिटर डायरी और रजिस्टर में ऐसी कोई डिटेल नहीं मिली जिसमें इन लोगों के आने या मिलने की कोई डिटेल हो। सीबीआई ने यह भी दावा किया कि राजा का कट-ऑफ-डेट निर्धारित करने का विचार था। सीबीआई के दावे के उलट वरिष्ठ अधिकारी श्रीवास्तव ने स्वीकार किया कि यह उनकी पहल थी। 

श्रीवास्तव का कहना है कि उन्होंने मौखिक तौर पर राजा के सचिव चंडोलिया को प्रपोजल तैयार करने के लिए कहा था। कोर्टन ने इससे संबंधित लिखित रेकॉर्ड जमा करने के लिए कहा। हालांकि, रेकॉर्ड में भी ऐसा कुछ नहीं मिला जो यह साबित कर सके कि इस तरह का कोई प्रस्ताव आधिकारिक तौर पर ए राजा की ओर से लाया गया था। 

 

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