Thursday , November 26 2020

150 साल पुराने कानून पर सुप्रीम कोर्ट का सवाल- व्यभिचार में पुरुष ही अपराधी क्यों?

सुप्रीम कोर्ट ने पूछा है कि व्यभिचार के मामले में हमेशा पुरुष ही अपराधी क्यों ठहराए जाते हैं, महिला क्यों नहीं। कोर्ट ने 150 साल पुराने इस कानून के प्रावधान की समीक्षा करने का फैसला लिया है। शीर्ष अदालत ने कहा कि यह प्रावधान महिला और पुरुष को समान नजर से नहीं देखता। साथ ही यह भी कहा कि आपराधिक कानून पुरुष और महिलाओं के लिए बराबर है, लेकिन आईपीसी की धारा-497 में इस सिद्धांत का अभाव है।
चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने धारा-497 का परीक्षण करने का निर्णय लेते हुए कहा कि कोई कानून महिलाओं को यह कहते हुए संरक्षण नहीं दे सकता कि व्यभिचार के मामले में हमेशा महिलाएं पीड़िता होती हैं। सुप्रीम कोर्ट यह देखेगा कि धारा-497 में सुधार किया जा सकता है या नहीं। धारा-497 के तहत व्यभिचार को अपराध की श्रेणी में रखा गया है, लेकिन यह अपराध पुरुषों तक ही सीमित है। 

शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि जब समाज प्रगति करता है तो लोगों को नए अधिकार मिलते हैं। नई सोच पैदा होती है। ऐसे में धारा-497 का पुनरीक्षण जरूरी है। पीठ ने यह भी कहा कि जब संविधान महिलाओं और पुरुषों को एकसमान अधिकार देता है तो कानून महिलाओं को पराधीनता के तौर पर कैसे देख सकता है। सुप्रीम कोर्ट अब चार हफ्ते बाद मामले की सुनवाई करेगा।

महिला हर परिस्थिति में पीड़िता

पीठ ने गौर किया कि यदि पुरुष का किसी दूसरे की पत्नी के साथ संबंध हो, तो इस मामले में कानून उस महिला को व्यभिचारी नहीं मानता। वहीं पुरुषों को इस अपराध के लिए पांच वर्ष तक की सजा का प्रावधान है। धारा-497 हर परिस्थिति में महिला को पीड़िता मानती है, जबकि पुरुषों को आपराधिक मुकदमा झेलना पड़ता है।

क्या है मामला
सुप्रीम कोर्ट केरल निवासी जोसफ शिन की याचिका पर सुनवाई कर रही है। याचिका में धारा-497 पर पुनर्विचार करने की गुहार लगाई गई है। याचिका में इस प्रावधान को भेदभावपूर्ण और लिंग भेद वाला बताया गया है।

पीठ ने उठाए ये सवाल
डेढ़ सौ वर्ष पुराने कानूनी प्रावधान पर पीठ ने सवालों की झड़ी लगा दी। पूछा क्या यह कानून भेदभावपूर्ण नहीं है? यह कहने से कि महिला पर अपराध नहीं बनता, क्योंकि उसमें पति की सहमति है, क्या इस तरह कानून महिलाओं की प्रतिष्ठा को कम नहीं करता? क्या इससे महिला की व्यक्तिगत पहचान को चोट नहीं पहुंचाती? क्या यह महिलाओं को उत्पाद की तरह समझना नहीं है? क्या ऐसे प्रावधान से महिलाओं को गुलाम की तरह समझना नहीं है? 

 
 
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