Friday , November 27 2020

महाराष्ट्र में एकला चालो के मूड में शिव सेना

इन दिनों महाराष्ट्र की राजनीति नई करवट लेती नजर आ रही है.भाजपा -शिव सेना गठबंधन में दोनों एक दूसरे को किनारा करने की तैयारी में जुटे हैं. जहाँ भाजपा शिव सेना से मुक्त होने के लिए राज ठाकरे पर डोरे डाल रही है , वहीं शिव सेना ने इस बार लोक सभा और विधान सभा चुनाव अकेले लड़ने का मन बनाते हुए भाजपा को सबक सिखाने की सोची है, ताकि फिर समझौते की शर्तों पर भाजपा को झुकाया जा सके.इन दिनों महाराष्ट्र की राजनीति नई करवट लेती नजर आ रही है.भाजपा -शिव सेना गठबंधन में दोनों एक दूसरे को किनारा करने की तैयारी में जुटे हैं. जहाँ भाजपा शिव सेना से मुक्त होने के लिए राज ठाकरे पर डोरे डाल रही है , वहीं शिव सेना ने इस बार लोक सभा और विधान सभा चुनाव अकेले लड़ने का मन बनाते हुए भाजपा को सबक सिखाने की सोची है, ताकि फिर समझौते की शर्तों पर भाजपा को झुकाया जा सके.  उल्लेखनीय है कि भाजपा भी शिवसेना द्वारा मोदी सरकार पर लगातार हो रहे हमलों से दुखी होकर उसका विकल्प तलाशने में लगी हुई है. इसलिए पार्टी ने नारायण राणे को न केवल पार्टी में शामिल किया बल्कि उनको राज्यसभा की सीट तक भी पहुँचाया.वहीं अब खबर यह है कि पार्टी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) प्रमुख राज ठाकरे पर नजर गड़ा रही है,क्योंकि वे ही अपने चचेरे भाई और शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे का मुकाबला कर सकते हैं.  जबकि इसके विपरीत  शिवसेना ने लोकसभा और विधानसभा के चुनाव अकेले लडऩे का फैसला किया है.हालाँकि शिव सेना जानती है कि वह अकेले लोकसभा की 18 सीटें नहीं जीत सकती मगर वह भाजपा को एक सबक सिखाना चाहती है, ताकि भगवा पार्टी के साथ भावी समझौते की शर्तों को फिर से लागू किया जा सके.इस फैसले से लोकसभा चुनाव में कांग्रेस-राकांपा गठबंधन को मदद मिलेगी ,लेकिन 2019 के आखिर में होने वाले विधानसभा चुनावों में शिव सेना को इसका फायदा जरूर होगा.

उल्लेखनीय है कि भाजपा भी शिवसेना द्वारा मोदी सरकार पर लगातार हो रहे हमलों से दुखी होकर उसका विकल्प तलाशने में लगी हुई है. इसलिए पार्टी ने नारायण राणे को न केवल पार्टी में शामिल किया बल्कि उनको राज्यसभा की सीट तक भी पहुँचाया.वहीं अब खबर यह है कि पार्टी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) प्रमुख राज ठाकरे पर नजर गड़ा रही है,क्योंकि वे ही अपने चचेरे भाई और शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे का मुकाबला कर सकते हैं.

जबकि इसके विपरीत  शिवसेना ने लोकसभा और विधानसभा के चुनाव अकेले लडऩे का फैसला किया है.हालाँकि शिव सेना जानती है कि वह अकेले लोकसभा की 18 सीटें नहीं जीत सकती मगर वह भाजपा को एक सबक सिखाना चाहती है, ताकि भगवा पार्टी के साथ भावी समझौते की शर्तों को फिर से लागू किया जा सके.इस फैसले से लोकसभा चुनाव में कांग्रेस-राकांपा गठबंधन को मदद मिलेगी ,लेकिन 2019 के आखिर में होने वाले विधानसभा चुनावों में शिव सेना को इसका फायदा जरूर होगा.

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