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स्कूल बैग्स का बोझ नहीं, अब टैबलट से पढ़ाई करेंगे 8वीं क्लास के स्टूडेंट्स

उत्तराखंड में डिजिटल इंडिया के मद्देनजर बच्चों के कंधों से बोझ कम करने के मकसद से एक बड़ी पहल की गई है। इसके तहत पहली बार निजी 163 वर्ष पुराने स्कूल में बच्चों की शैक्षिक योग्यता निखारने के लिए टैबलट बेस्ड लर्निंग क्लासरूम की शुरुआत की गई। यही नहीं, अब देहरादून के हाथीबड़कला केंद्रीय विद्यालय में भी 124 बच्चों को टैबलट बांटे गए हैं। 

टैबलट के जरिए पढ़ाई कराने के पीछे उद्देश्य बच्चों के बस्तों से बोझ को कम करने के साथ ही पढ़ाई को रुचिकर बनाना है। डिजिटल इंडिया को बढ़ावा देने के लिए अब केंद्र सरकार के मानव संसाधन मंत्रालय ने ई-प्रज्ञा कार्यक्रम के तहत देहरादून में हाथी बड़कला स्थित केंद्रीय विद्यालय का चयन पायलट प्रॉजेक्ट के तहत किया है। 

5 वर्षों के लिए दिए गए हैं टैबलट 
मेक इन इंडिया के तहत ये टैबलट्स ग्वालियर की एक कंपनी के द्वारा स्वदेशी कंपनी को बढ़ावा देने के मकसद से बनाए गए हैं। 8वीं क्लास के 124 बच्चों को यह टैबलट 5 साल के लिए दिए गए हैं, जिसके ज़रिए बच्चे विडियो के ज़रिए आसानी से चैप्टर समझकर पढ़ाई कर रहे हैं। 

रिपेयरिंग से लेकर रिप्लेसमेंट तक की गारंटी 
बस्तों का बोझ कम करने के लिए इस पहल की काफी सराहना भी की जा रही है। हालांकि, कुछ टैबलट्स में शुरुआती दौर में खराबी की शिकायत भी आ रही है जिसको दूर करने के लिए कंपनी के इंजिनियर पहुंचे। दरअसल 5 साल के लिए इसकी रिपेयरिंग से लेकर रिप्लेसमेंट तक की गारंटी है। हर साल इसमें एचडी कार्ड बदलकर नई क्लास का सिलेबस इंस्टॉल किया जाएगा। 

जानिए, क्या होंगे फायदे 
पायलट प्रॉजेक्ट के तौर पर वितरित किए गए टैबलट का यह प्रयोग यदि कामयाब होता है तो बच्चों के कंधों से बस्तों का बोझ तो कम होगा ही साथ ही कागजों के लिए पेड़ों का कटान भी कम होगा, जिससे हमारे पर्यावरण संरक्षण में मदद मिलेगी। 
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